Thursday, May 13, 2021

  मुकुल जी

 

 

याद नहीं आता कहाँ से शुरू करूँ, यादों की परछाइयाँ एक दूसरे से उलझी सी आँखों के सामने तैर जाती हैं। एक कोना पकड़ने की कोशिश करता हूँ तो दूसरा छू कर निकल जाता है। फिर एकाएक अपने को एक बियाबान में पाता हूँ अकूत सन्नाटा है जहां बहुत कम लोग आते जाते हैं, मुकुल जी उनमें से एक थे और अब ये आवाजाही और कम हो जाएगी। बहुमुखी प्रतिभा के धनी मुकुल जी से मेरा पहला परिचय बीआईटी मेसरा में हुआ जब मैं अपना स्नातकोत्तर कर रहा था और वे भी । ना वो मेरी कक्षा में थे ना ही मेरे शहर से या और भी कोई अन्य प्रत्यक्ष समानता परंतु एक ही वह डोर थी जो हमें बांधती थी वो थी विचारों की समानता और शायद यही एक सूत्र परम है अन्यथा तो हम बहुत से कृत्रिम सूत्रों से लोगों को बांध लेते हैं जो ना तो स्थायी होते हैं और ना ही मज़बूत। दुबले पतले परंतु बेहद सिद्धांतवादी, किसी को भी खरी खरी उसके सामने बोल देने वाले परंतु दीन व्यक्ति के लिए करुणा से भरे, ये थे हमारे मुकुल जी। वैसे तो मुकुल जी आईटी प्रोफ़ेशनल थे पर उनके अपने शब्दों में “मैं एक किसान हूँ जो अभी खेती नहीं करता है”, हृदय से वे किसान ही रहे। 

ऐसी अनगिनत घटनाएँ होंगी जब मुकुल जी ने किसी राह चलते ज़रूरतमंद व्यक्ति को अस्पताल पहुँचाया या पानी पिलाया या कोई और मदद की, एक कोमल हृदय व्यक्ति होने की वजह से वे किसी मजबूर व्यक्ति को विपदा में छोड़ कर आगे नहीं जा सकते थे।  शायद २००३ की बात है जब मैं नोएडा में रहता था, मुकुल जी भी वहीं रहते थे और शेष जीवन वहीं रहे। मैं एक बार उनसे मिलने उनके घर गया जहां संजय जी भी उनके साथ रहते थे। शाम का समय था और ऐसा विचार हुआ की गली में हलवाई की दुकान पर जा के समोसों का आनंद लिया जाए। जब हम दुकान के सामने खड़े होकर समोसों के तैयार होने का इंतज़ार कर रहे थे और आपस में देश काल की समस्याओं पर वार्तालाप भी चल रहा था। जैसा कि भारत में अक्सर देखा जाता है छोटे मोटे होटलों और खाने के ठेलों पर छोटे छोटे बच्चों को काम पर रखा जाता है। हालाँकि इसके ख़िलाफ़ सरकार ने नियम बनाएँ हैं पर वे काग़ज़ों तक ही सीमित हैं, वे कभी बाल श्रम को खत्म करने में प्रभावी नहीं रहे। एक ११-१२ साल का बच्चा हमें प्लेट में समोसे देने आया। मुकुल जी ने कुछ कौतूहल कुछ शिष्टाचार वश उससे पूछ लिया 

“बाबू कैसे हो”। 

“कैसे रहेंगे सर ग़रीब हैं मेहनत मज़दूरी करते हैं, शाम के समय खेलने नहीं जा सकते क्योंकि काम करना है”

बात मुकुल जी को चुभ गयी, उन्होंने भीगी आँखों से उनकी जेब में सौ सौ के जितने नोट थे सब उस बच्चे को दे दिए। बच्चा हतप्रभ था, उसे यह उम्मीद हरगिज़ नहीं थी। बच्चा पैसे लेने में ना नुकुर करता रहा पर मुकुल जी के सामने उसकी एक ना चली। 

आज सुबह सुबह संजय जी का संदेश आया की मुकुल जी एक लम्बी लड़ाई लड़ने के बाद कोरोना महामारी से जंग हार गए। इस त्रासदी में जब पूरा भारत इस महामारी की चपेट में है मुकुल जी एक हॉस्पिटल बेड एक रेमेडेसिविर इंजेक्शन की लड़ाई लड़ते लड़ते इस दुनिया को अलविदा कह गए। मुकुल जी जिन्होंने सारी ज़िंदगी जरूरतमंदों की मदद की उनको अगर उनकी ज़रूरत के समय सही स्वास्थ्य सुविधा मिल जाती तो आज वो हमारे बीच होते। सरकार, समाज, व्यवस्था सभी ने उन्हें निराश किया, किसकी कितनी ज़िम्मेदारी है यह तो आने वाले दिन महीने और साल तय करेंगे पर आज की परम सत्य यह है की मुकुल जी हमारे साथ नहीं हैं। शायद यह समाज ही आपके योग्य नहीं था मुकुल जी जहां कहीं भी हों आपको शांति मिले और सुखी रहें यही कामना है। 


मुकुल जी की कहानियाँ प्रतिलिपि पर  

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Friday, August 24, 2018

अमरूद महाराज!

बारिश के दिनों में एक चिंता तो हमेशा खाए जाती थी कि आज खेल की छुट्टी, ये दिन बेकार ही चला जाएगा। धीरे धीरे फैलती शाम की स्याही सबको अपने आप में समेट लेगी, फिर रात और अगला सवेरा।  वैसे ये भी बड़ा अनोखा संयोग होता, कि बारिश की उन शामों में बिजली निश्चित रूप से ग़ायब रहती, जिससे प्रकृति की अनुभूति और सजीव हो जाती थी। झींगूरों का लय, मेंढकों की तान और मच्छरों का कोरस इसी शाश्वत सत्य का संगीत होता। 

       तभी आकाश में धूप की एक पट्टी सी नज़र आयी, जैसे कैनवास के एक सिरे से दूसरे सिरे तक किसी ने पिले रंग से ब्रश घुमा दी हो। बरामदे से निकल कर देखा तो पता चला धूप निकल चुकी थी, बारिश भी थम चुकी थी और बादल भी धीरे धीरे छँट रहे थे। इस बात की ख़ुशी थी की चलो ये शाम बर्बाद होने से  बच गयी, पर अब समस्या ये थी की इस शाम का सदुपयोग कैसे किया जाय। बाहर मुहल्ले में निकल कर इधर उधर घूमा, पर मेरे करामाती दोस्तों का कहीं पता नहीं था। बिलकुल उसी तरह जैसे तालाब में पत्थर फेंकने से सारे मेंढक पानी में ग़ायब हो जाते हैं और थोड़ी देर के बाद ही  एक एक करके ऊपलाते हैं। मैंने अपने चारों तरफ़ नज़र डाली, हर तरफ़ पानी भरा था और मेरी हालत उस ऊपलाने वाले पहले मेंढक से ज़्यादा अलग नहीं थी। ये विचार आते ही मैंने सोचा, दोस्तों के जुटने से पहले कुछ और कर लिया जाय, पर क्या? तभी सोचा क्यों ना फलों के पेड़ों की ख़बर ले ली जाय। मुहल्ले में और आसपास आम, लीची, इमली, जामुन के बहुत से पेड़ थे और मौसम के हिसाब से पके फल हमें मिलते रहते । वैसे तो अमरूद के पेड़ भी काफ़ी थे पर उन्हें बाक़ी फलों की तरह इज्जत नहीं मिलती थी। शायद इसकी वजह ये थी की वो हमेशा आसानी से मिल जाते थे। किसी भी मौसम में अगर अच्छी तरह खोजा जाए एक ना एक पेड़ पर पके अमरूद ज़रूर मिल जाते।किसी और फल के मिलने की उस समय ज़्यादा गुंजाइश नहीं थी, इसलिए ये विचार भी छोड़ कर चहारदीवारी के ऊपर, पूरे मुहल्ले का एक चक्कर लगाने का मन बनाया।कम से कम पानी में घूमने से तो अच्छा ही रहेगा। 

     अभी चहारदीवारी के ऊपर घूमते घूमते थोड़ी दूर गया था की पास के एक आहाते को देख के रुक गया।  यह एक ऐसा अहाता था जिसके बारे में हमें ज़्यादा मालूम नहीं था। यह काफ़ी ऊँची दीवारों से घिरा था और एक तरफ़ गेट लगा था, जिसमें हमेशा ताला लगा रहता। ताले में जंग लग चुका था और गेट  के आसपास काफ़ी ऊँची ऊँची घास और झड़ियाँ उग आयी थी। हमने कभी भी किसी को उस आहाते में जाते या आते नहीं देखा था।  उन दिनों हमें अपने घर के एक मील की परिधि में होने वाली हर घटना की जानकारी होती, जितना की आजकल सोशल मीडिया से कनेक्टेड बच्चों को भी नहीं होती। फिर मैंने सोचा अच्छा मौक़ा है सिर्फ़ मुआयना करके आ जाऊँगा, दोस्तों को बताने के लिए शायद कोई नई जानकारी मिल जाए। 

      थोड़ी देर बाद मैं अहाते की दीवार पर खड़ा था। ध्यान से अंदर की चीज़ों का निरीक्षण किया। एक तरफ़ जंग लगती हुई रद्दी चीज़ें पड़ी थी, दूसरी तरफ़ कुछ अमरूद के पेड़ थे और चारों तरफ़ घुटने जितनी ऊँची घास उग आयी थी। कुछ पके अमरूद भी पेड़ों पे नज़र आए, पर इसमें क्या नयी बात थी वो तो हमेशा रहते हैं और चंद अमरूदों के लिए मैं नीचे उतरने की ज़हमत नहीं लेने वाला। थोड़ा और पास जा के देखा तो पूरा मामला ही अलग दिखाई दिया। क़रीब आठ दस अमरूद के पेड़ों पे पचास से भी ज़्यादा पके अमरूद, उन्हें खाते हुए एक दर्जन से ज़्यादा तोते, चार पाँच ततैया के छत्ते और ज़मीन पर चिड़ियों द्वारा आधा खा के गिराए हुए अमरूदों का अम्बार। मुझे कुछ कुछ कोलंबस जैसा अनुभव हो रहा था, नयी जगह खोज निकालने का। अब मामला बदल चुका था, इतने सारे पके बेहतरीन अमरूदों को ऐसे ही छोड़ के जाना मुश्किल था। 

    ख़ैर, मैं नीचे उतरा और क़रीब पच्चीस तीस  सबसे अच्छे अमरूद तोड़े। मेरी क़िस्मत अच्छी थी की ततैया के एक छत्ते को ग़लती से छेड़ने के बावजूद बाल बाल बच गया। अब इतने अमरूदों को रखने के लिए पॉकेट में जगह तो होती नहीं है। पर ऐसे मौक़ों के लिए जो हमारा जाना परखा जुगाड़ होता था उसका इस्तेमाल करना पड़ा। शर्ट को पैंट में खोंसने के बाद शर्ट का जो झोला बन जाता है उसका भरपूर इस्तेमाल हुआ।  वैसे ये उपाय मम्मी पापा से छुपा के कॉमिक्स के आदान प्रदान में भी काफ़ी उपयोग में आता था। सारे अमरूदों को अपनी शर्ट में भरे शायद मैं खेतों में लगाए पुतले की तरह लग रहा होऊँगा,पर अपने दोस्तों के लिए सांता क्लाज से कम नहीं। उस दिन मुहल्ले में दोस्तों के साथ क्या ज़बरदस्त अमरूद पार्टी हुई, जिसे शायद ही उन दोस्तों में से कोई भूलेगा। 


          कई सालों बाद अमेरिका में रहते हुए न्यू जर्सी के किसी देसी दुकान में सब्ज़ियाँ ख़रीद रहा था। मेरी नज़र क़रीने से रखे मुस्टंडे अमरूदों पर पड़ी। अनायास ही मुझे अमरूद पार्टी याद आ गयी, अमरूदों का स्वाद लिए भी कई साल हो चुके थे, सोचा चलो कुछ ले लिए जाएँ। मैंने सबसे बड़े दो अमरूद पसंद कर लिए, थोड़ी देर बाद मैं पैसे देने के काउंटर पर था। एकाएक दुकानदार ने मुझसे पूछा क्या आप दोनों अमरूद लेंगे? भला ये कैसा सवाल हुआ, मुझे लगा कि शायद ज़्यादातर लोग दो अमरूद नहीं लेते होंगे। तभी मेरी नज़र प्रदर्शित मूल्य की तरफ़ गयी और सारा माजरा मेरी समझ में आया।हालाँकि अमरूद काफ़ी बड़े थे पर मैंने ये नहीं सोचा था की उनकी क़ीमत चावल के बोरे से भी ज़्यादा होगी, दुकान में मौजूद महँगे से महँगे फल से कम से कम तीन गुनी। अब मुझे दोनों अमरूद महाराज और महारानी की तरह लग रहे थे और दुकानदार द्वारपाल की तरह जो मुझसे पूछ रहा हो क्या चाहते हो बालक? मैंने धीरे से जवाब दिया अमरूद रहने दो इस बार। आज मुझे अमरूद की सही क़ीमत का अहसास हुआ था। भले ही आम को फलों का राजा कहते हैं पर उस दिन के बाद मेरे लिए फ़लों के महाराज अमरूद ही रहे और मैंने उनकी शान में कोई गुस्ताखी नहीं की या उन्हें हल्के में नहीं लिया। यही सच है, वो चीज़ें जो हमेशा हमारे पास होती हैं हमें उनकी सही क़ीमत उनके दूर जाने के बाद ही महसूस होती है, और यही बात शायद लोगों पर भी लागू होती है।
                                                                                                  ~ अरुण कुमार